बस्तर के नाग और उनकी जड़ें (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 57)
नागों की तीन मुख्य शाखाओं ने कर्नाटक को अपनी कर्मस्थली बनाया। ये तीन शाखाये हैं - सेन्द्रक शाखा; सेनावार शाखा तथा सिन्द शाखा। नागों की सेन्द्रक शाखा दक्षिण का शक्तिशाली राजवंश बन कर उभरी और उसका...
View Articleभोई से पामभोई (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 56)
वर्ष 1324, वारंगल से 200 घुडसवारों के साथ चालुक्य राजकुमार अन्नमदेव ने गोदावरी पार कर भोपालपट्टनम में प्रवेश किया। भद्रकाली संगम की ओर से नदी पार करने के पश्चात अन्नमदेव ने साथियों के साथ भोपालपट्टनम...
View Articleरानी से महारानी बनायी गयीं प्रफुल्ल कुमारी (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग...
बस्तर के राजाओं को कठपुतली बनाये रखने के लिये अंग्रेजों को जो भी यत्न करना पड़ा उन्होंने निरंतर किया है। बस्तर राज्य की शासिका प्रफुल्ल कुमारी देवी (1921 – 1936 ई.) का सम्बोधन 1 अप्रैल 1933 में “रानी”...
View Articleरामलीला से आरम्भ हुआ बस्तर में रंगकर्म (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 54)
बस्तर में ज्ञात रंग कर्म का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। सन 1913 में बनारस से एक रामलीला मंडली राजधानी जगदलपुर पहुँची। मंड़ली ने कई दिनों तक राजमहल में रामलीला का मंचन किया। इससे प्रभावित हो कर सन 1914...
View Articleआस्था और मनोकामना (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 53)
बस्तर में चालुक्य वंश के संस्थापक अन्नमदेव से ले कर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव तक सभी की देवी दंतेश्वरी पर प्रगाढ आस्था थी। इस आशय के अनेक दृष्टांत, विवरण अथवा किम्वदंतियाँ पढ़ने सुनने को मिलती रहती...
View Articleकच्चा महल-पक्का महल (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 52 )
राजा दलपत देव ने जगदलपुर राजधानी के स्थानांतरण के पश्चात जिस राजमहल का निर्माण करवाया वह काष्ठ निर्मित थी एवं उसकी छत पर खपरैल लगायी गयी थी। वर्ष 1910 के महान भूमकाल आंदोलन के पश्चात ब्रिटिश शासन को यह...
View Articleगोलकुण्डा की शह पर भेजी विद्रोह (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 51)
इतिहास को जनश्रुतियों और लोकगीतों से भी खुरच कर निकाला जा सकता है। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के दौरान पोटानार (जगदलपुर) के ग्रामीण रथ के आगे नाचते गाते चलते हैं तथा अनेक ऐसे गीत गाते हैं जिनमे...
View Articleविजय-पराजय (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 50)
एक बड़ी विजय कैसे निर्णायक पराजय में बदल जाती है इसका उदाहरण भूमकाल आंदोलन का आखिरी चरण है। आंदोलन के दमन के लिये 24 फरवरी 1910 की सुबह मद्रास और पंजाब बटालियन जगदलपुर पहुँच गयी। जबलपुर, विजगापट्टनम,...
View Articleताड़-झोंकनी (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 49)
राजा दलपतदेव (1731-1774 ई.) ने अपनी पटरानी के बेटे राजकुमार अजमेरसिंह को डोंगर का अधिकारी बनाया था। उस समय डोंगर क्षेत्र भयानक अकाल से जूझ रहा था तथा जनश्रुतियाँ कहती हैं कि आजमेरसिंह के कुशल प्रबन्धन...
View Articleवीर गेंद सिंह की शहादत (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 48)
परलकोट नैसर्गिक स्थल है। उसकी सीमा को एक ओर से कोतरी नदी निर्धारित करती है। तीन नदियों का संगम परलकोट की सुन्दरता को चार चाँद लगा देता है। यहाँ के जमीन्दार को भूमिया राजा की उपाधि प्राप्त थी। ऐसी...
View Articleस्त्रीराज्य बस्तर और महारानी प्रमिला (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 47)
महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात युधिष्ठिर ने जब अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ा था, तब उस घोड़े की रक्षा में स्वयं अर्जुन सेना के साथ चले थे। दक्षिण की ओर चलते चलते युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा...
View Articleनमक के बोरे में आक्रांता (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 46)
राजा दलपतदेव (1731-1774 ई.) के समय तक मराठा राज्य की सीमा बस्तर से लग गयी थी। मराठा शासकों ने अपनी विस्तारवादी नीति के तहत पहले रतनपुर पर विजय हासिल की तथा इसके पश्चात नीलू पंडित के नेतृत्व में वर्ष...
View Articleबल, छल, वीरगति और विजय (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 45)
सत्ता को ले कर पारिवारिक खींचातानी, षडयंत्र, छल आदि एक दौर की सामान्य घटना हुआ करती थी। ऐसे में स्थिति तब अधिक जटिल हो जाती थी जब आंतरिक कलह का लाभ उठा कर निकटवर्ती राज्य आक्रमण कर दे। बस्तर में ऐसा ही...
View Articleमधुरांतक देव और नरबलि बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ (भाग – 44)
बस्तर अंचल में नाग राजाओं का शासन विभिन्न मण्डलों में विभाजित करता था, इन्ही में से एक था मधुर मण्डल जिसमें छिन्दक नागराजाओं की ही एक कनिष्ठ शाखा के मधुरांतक देव का आधिपत्य था। चक्रकोट के राजा धारवर्ष...
View Articleबस्तर में सागर (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 43)
हमने उन विरासतों को भी नहीं सम्भाला जो हमारी ही सुरक्षा के निमित्त निर्मित किये गये थे। छत्तीसगढ राज्य के ऐतिहासिक दृष्टि के महत्वपूर्ण सबसे बडे मानव निर्मित जलाशयों में से एक दलपतसागर, आज अपने...
View Articleगोपनीयता और क्रांति (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 42)
योजना और अनुशासन का ऐसा उदाहरण विश्व में घटित सफलतम क्रांतियों में भी कम देखा गया है जहाँ एक विशाल भूभाग आंदोलित हो लेकिन उसकी तैयारियों की भनक व्यवस्था को न लग सके। वर्ष 1910 के भूमकाल की अनेक...
View Articleराजा-प्रजा दोनो के नाम से राजधानी (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 41)
राजाओं-महाराजाओं के नाम पर कितने ही नगर और शहर बसे हैं लेकिन ऐसे उदाहरण इतिहास में कम है जब प्रजा के नाम पर उन्होंने ऐसा किया हो। इसके ही अपवाद स्वरूप जगदलपुर शहर के बसने और उसके नामकरण की रुचिकर कहानी...
View Articleअंग्रेजों वाला विकास (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 40)
रायबहादुर पंडा बैजनाथ (1903 – 1910 ई.) बस्तर राज्य में अधीक्षक की हैसियत से नियुक्त हुए थे। वे अंग्रेजों द्वारा प्रसारित विकास की परिभाषा से अक्षरक्ष: सहमत थे और अपनी सोच के प्रतिपादन को ले कर कट्टर...
View Articleजन-संघर्ष और स्कंदवर्मन (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 39)
अर्थपति भट्टारक (460-475 ई.) राजसिंहासन पर बैठे तब महाकांतार से कोशल तक तथा कोरापुट से बरार तक के क्षेत्र पर नल-त्रिपताका लहराने का दौर था। अर्थपति विलासी शासक प्रतीत होते हैं, कदाचित व्यसनी। वाकाटक...
View Articleकॉग्रेस का काकीनाड़ा अधिवेशन और बस्तर (बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ, भाग – 38)
यह बार बार उठने वाला प्रश्न है कि जिस दौरान राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन मुखर था, उन दिनों बस्तर के भीतर कैसी गतिविधियाँ चल रही थीं? बस्तर रियासत ने एकजुटता के साथ अंग्रेजों का विरोध किया, इसका बड़ा...
View Article